गुट निरपेक्षता की नीति की सार्थकता भारत के संबंध में
डाॅ. मणि मेखला शुक्ला
सहायक प्राध्यापक राजनीतिशास्त्र, कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भिलाईनगर, जिला दुर्ग छ.ग.
अंर्तराष्ट्रीय राजनीति मे गुट निरपेक्ष नीति का एक महत्वपुर्ण स्थान है । द्वितीय विश्वयुद्व के पश्चात् यूरोप के सभी राष्ट्रो मे अपनी स्वतंत्रता को बनाये रखने की समस्या थी । तब दो महाशक्तियाॅ विश्व रंग मंच पर उभर कर सामने आई । ये महाशक्तियाॅ थी संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत समाजवादी गणतंत्र संघ इसी समय अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के अनेक देश औपनिवेशक दासता से स्वंतंत्र हो रहे थे । इन नवोदित राष्ट्रो ने स्वंय को महाशक्तियों के गुटो मे शामिल रहने की अपेक्षा गुट निरपेक्ष नीति को अपनाना उचित समझा ।
गुट निरपेक्षता की नीति का सर्वप्रथम उल्लेख सिंतबर 1947 मे वायसराय की कार्यकारी परिषद कि उपाध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू ने अपने प्रथम भाषण मे किया था । उन्होने कहा था कि “ वैदेशिक मामलो मे जहाॅ तक संभव होगा । हमारी प्रस्तावित नीति दुनिया के किसी भी गुट से दूर रहने की होगी । विश्व राजनीति मे अमेरिका एंव सोवियत संघ एक दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोले हुये है । और हम इनके विवाद मे नही पडना चाहते । “
द्वितीय विश्व युद्व के पश्चात् अंतर्राष्ट्रीय राजनीति मे परिवर्तन लाने वाले तत्वो मे गुट निरपेक्षता का अपना विशेष महत्व है । इस आंदोलन का जन्म कोई संयोग नही बल्कि यह सुविचारित धारणा थी । इसका उद्देश्य नवोदित राष्ट्रांे की स्वतंत्रता की रक्षा करना एंव युद्वो को रोकना था । गुट निरपेक्षता की नीति का उदय का प्रमुख कारण था साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद से मुक्ति पाने वाले देशो के शक्तिशाली गुटो से अलग रखकर उनकी स्वतंत्रता को सुरक्षित रखना था । 1947 मे स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने गुट निरपेक्ष नीति को अपनी विदेश नीति का हिस्सा बनाया । इसके बाद संयुक्त राज्य अमेरिका एशिया और अफ्रीका ने भी गुट निरपेक्ष नीति के प्रति अपनी आस्था प्रकट की । 1961 मे बेलग्रेड शिखर सम्मेलन में भाग लेने वाले देशो की संख्या 25 थी । कार्टगन शिखर सम्मेलन मे अक्टुबर 1995 में 108 राष्ट्र सम्मिलित हुये । आज निर्गुट आंदोलन के सदस्य राष्ट्रो की संख्या 120 है । गुटनिरपेक्षता से अभिप्राय है, अपनी स्वतंत्र नीति से है । गुटो से अलग रहकर प्रत्येक प्रश्न का औचित्स और अनौचित्य देखा जा सकता है । जार्ज श्वार्जनबर्गर ने गुट निरपेक्षता के 6 अर्थ बताये है । अलगाववाद, अप्रतिबद्धता, तटस्थता, तटस्थीकरण एक पक्षवाद और असंलग्नता । गुटनिरपेक्षता की नीति पिछले पांच दशक से चल रही है । आज संयक्त रा्ष्ट्र संघ के अधिकांश देश इसे व्यवहार मे ला रहे है । गुट निरपेक्षता का अर्थ गुटो पृथक रहने की नीति से है । अर्थात् गुट निरपेक्षता देश महाशक्तियो के प्रति गुट और दोश के आधार पर अपनी स्वतंत्र नीति का निर्धारत कर सभी राज्यो के साथ शांतिपूर्ण सहअस्तित्व एंव सहयोग के आधार पर संबध स्थापित करें ।
द्वितीय विश्वयुद्व के पश्चात् एशिया और अफ्रीका ने नवस्वतंत्रता प्राप्त राष्ट्र® व्दारा गुटनिरपेक्षता की नीति को अपनाने का प्रमुख कारण शीत युद्व था । द्वितीय विश्वयुद्व के बाद विश्व दो गुटो मे बट गया था । पूंजीवादी गुट का नेतृत्व संयुक्त राज्य अमेरिका एंव साम्यवादी गुट का नेतृत्व सोवियत संघ व्दारा किया जा रहा था । दोनो पक्षो मे तीव्र तनाव वैमनस्य और मतभेद उत्पन्न हो गये थें उनमे एक दूसरे के विरूद्व आरोप प्रत्यारोप का राजनीति प्रचार प्रारम्भ हो गया था । बारूद के गोलो के स्थान पर अखबारो से लडे जाने वाले इस युद्व को शीतयुद्व की संज्ञा दी गई । इस वातावरण मे नवस्वतंत्र राष्ट्रो के किसी भी पक्ष मे न रहने का निर्णय लिया । अंतराष्ट्रीय राजनीति मे यह नीति आगे चलकर गुट निरपेक्षता के नाम से जानी लगी । गुटनिरपेक्ष आंदोलन मे भारत की भूमिका संक्रिय एंव महत्वपूर्ण रही । यह मार्गदर्शन एंव नेतृत्व की थी । भारत विश्व का पहला देश है जिसने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति मे इस नीति की व्याख्या की और प्रसार किया तथा नवस्वतंत्र देशो को अपनाने के लिये प्रेरित किया उन्हे संगठित करने का प्रयास किया । इसके संस्थापक नेहरू , टीटो, नासिर, सुकेर्णो तथा एन्क्रुमा थें । गुट निरपेक्षता की नीत के प्रति भारत की दुढ निष्ठा स्वतंत्रता आदोलन की ऐतिहासिक परिस्थितियों मे उत्पन्न हुई । 1947 मे नेहरू जी ने एशियायी देशो की शक्ति एंव एकता प्रदर्शित करने के लिये एशियायी देशो का सम्मेलन आमंत्रित किया । जनवरी 1949 मे भारत ने 18 सदस्यो का एक सम्मेलन नई दिल्ली मे आमंत्रित किया जिसमे इंडोनेशिया की स्वतंत्रता के प्रति कार्यवाही करने के लिये संयुक्त राष्ट्र संघ से प्रार्थना की । 1955 मे इंडोनेशिया के एक शहर बाण्डुग मे एशियायाी एंव अफ्रीकी देशो का एक सम्मेलन हुआ इसी सम्मेलन मे गुट निरपेक्षता आंदोलन की नींव रखी गई । इस सम्मेलन मे उपस्थित 25 देशो व्दारा उपनिवेशवाद का खंडन, नवस्वतंत्र राष्ट्र का विकास एंव सहयोग की अनिवार्यता, पंचशील एंव शांतिपूर्ण सहकारिता के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय तनावों का दूर करने की मांगो ने इस आंदोलन को वैचारिक एव दार्शनिक आयामो पर बल दिया 1955 के बाण्डुग सम्मेलन मे भारत गुटनिरपेक्ष देशो का प्रमुख प्रववक्ता बन गया तथा एशिया और अफ्रीकी के नवस्वतंत्र राष्ट्रो व्दारा इस नीति का अनुसरण करना आवश्यक नियम बन गया । इस नीति के सफल प्रतिपादन का श्रेय भारत विशेष रूप मे नेहरूजी को जाता है ।
गुट निरपेक्षता के संबध मे नेपाल नरेश वीरेन्द्र का कहना था कि “ हम अपने क्षेत्र मे अपनी इच्छा न तो किसी के उपर थोपेंगें और न ही किसी अन्य शक्ति को इस बात की अनुमति प्रदान करेंगें कि वह हम पर अपनी अच्छा थोपें । हम गुटनिरपेपक्षता की नीति का समर्थन करते रहेंगें ।” पूव्र्र प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने भी कहा था कि ”प्रत्येक राष्ट्र और प्रत्येक व्यक्ति को यदि वे सवंय के प्रति ईमानदार है अपना रास्ता चुनना होगा और कई परीक्षण साहस दुखो और अनुभवो के होकर गुजरने के बाद यह प्राप्त होगा । अपना स्वरूप और अपना व्यक्तित्व कायम रखने के लिये इसी दुढ संकल्प से हम गुटनिरपेक्षता को अपनाते है ।” पीटर लियान का दृष्टिकोण है कि आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय संबधो से तटस्थता का एक कुटनीतिक एंव राजनीतिक अंश भी हो सकता है । प्रो. लल्लन जी का मत है कि तटस्थता मे कोई भी राष्ट्र युध्दरत राष्ट्रो के समान व्यवहार करता है जबकि गुट निरपेक्षता के कोई भी राष्ट्र अपने हितो को प्र®त्साहन देने के लिये किसी युध्दरत राष्ट्र का साथ दे सकता हेै इस प्रकार गुटनिरपेक्षता राष्ट्र विश्व की घटनाओ के प्रति उदासीन नही रहते बल्कि स्पष्ट और रचनात्मक नीति अपनाते है जो विश्व शांति कायम रखने मे सहायता कर सके देश मे आंतरिक अशांति और अव्यवस्था, विस्तुत क्षेत्रफल, बढती हुई जनसंख्या औद्योगिक पिछडापन और सैनिक अक्षमता जैसी अनेक समस्याये स्वतंत्रता के पश्चात भारत के समक्ष थी । इनकी समस्याओ के कारण भारत ने गुट निरपेक्षता की नीति को अपनाकर भोगौलिक और सामजिक संतुलन रखते हुई विदेशी आर्थिक एंव तकनीकी सहायता लेकर राष्ट्रीय विकास का मार्ग अपनाया अतः नेहरू जी ने घोषित किया कि चाहे जो भी हो जये हम किसी देश के साथ सैनिक संधि नही करेंगे । जब हम गुटनिरपेक्षता का विचार छोड देते है तो अपना स्थान छोडकर कहने लगते है किसी देश से बंधना आत्मसम्मान खोना है । यह अपने बहुमूल्य निधि का विनाश है ।
देश मे भारी उद्योगो की स्थापना मे सोवियत संघ ने मदद की । भारत ने रक्षा उपकरणो का आयात पश्चिमी देशो से ही किया और रक्षा से संबधित प्रशिक्षण भी पश्चिमी देशो से लिया । भारत ने रक्षा संबधी उपकरण सोवितयत संघ से खरीदे और उसका भुगतान अपरिवर्तन रूपये मे किया क्योकि भारत के पास विदेशी मुद्रा भंडार की कमी थी वही अमेरिका और उसके मित्र देशो का झुकाव पाकिस्तान की ओर हो चुका था । जवाहर लाल नेहरू दोनो महाशक्तियो से सहायता प्राप्त करना चाहते थें परतु वे किसी तीसरे संगठन के पक्षध्ार नही थें भारत ने गुटनिरपेक्षता देशो के आंदोलन की कभी भी तीसरे संगठन के रूप मे गठित करने की कोशिश नही की । गुटनिरपेक्षता आंदोलन की आज तक की सबसे प्रमुख कमी यह रही थी सम्मेलनों मे बडी बडी बाते होती है परंतु उसका प्रभाव नगण्य रहता है । संगठन के नेताओ व्दारा कभी यह प्रयास नही किया गया कि इस संगठन को संयुक्त राष्ट्र संघ की भांति मजबुत बनाया जाये और सदस्य राष्ट्रो को ऐसी प्रमुख समिति का निर्माण किया ज® सदस्य देशो के आपसी विवादो का निपटारा करने मे सक्षम हो परतु आज तक ऐसा कोई सार्थक प्रयास नही किया गया गुट निरपेक्ष आंदोलन पिछडे हुई देशो की ऐसी रंगमंच प्रस्तुत करता है जहाॅ से वे अपनी आवाज उठा सकते है । विश्व मे रंगभेद की नीति आर्थिक शाष्ेाण उपनिवेशवाद साम्राज्यवाद शस्त्र्ाो की दौङ आदि को समाप्त करने के लिये गुटनिरपेक्ष आंदोलन ंएक सशक्त माध्यम है और इसे अािधक प्रभावशाली बनाने की आवश्यकता है ।
पिछले अनेक वर्षो मे इस आंदोलन ने किसी भी महत्वपूर्ण मामलेा मे अपना योगदान देने मे सक्षम नही रहा है । अफगानिस्तान के तालिबान शासन की मनमानी मे यह आंदोलन मुक दर्शक रहा । 11 सितंबर 2001 को आंतकवादी घटना के पश्चात् जार्ज बुश ने अफगानिस्तान को सबक सिखाने के लिये सैनिक कार्यवाही प्रारंभ किया और उस समय गुटनिरपेक्ष देश कर्तव्य विमुख दिखाई पडें । जब सद्दाम हुसैन को नेस्ताबुद करने के उद्देश्य से जार्जबुश ने इराक के विरूद्व सैनिक कार्यवाही करने का प्रयास किया उस समय भी गुटनिरपेक्षता देश तमाशाबीन बन रहे । गुटनिरपेक्ष देशो को अंतर्राष्ट्रीय राजनीति मे विशेष महत्व प्राप्त नही होता क्योकि सदस्य देशो ने एकजुटता के अभाव मे जैसे भारत एंव पाकिस्तान के मध्य कटुता इनके जन्म से ही जारी है । पाकिस्तान को गुटनिरपेक्ष देश बनाने का श्रेय भारत को ही है ।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन को सशक्त बनाने मे भारत की भूमिका महत्वूपर्ण रही है । भारत का हमेशा से यह प्रयास रहा है कि गुटनिपरेक्ष देश अंतर्राष्ट्रीय ने महत्वपूर्ण भूूमिका का निर्वाह करें । आंदोलन के अग्रणी नेता पंडित जवाहर लाल नेहरू थें वे अंतराष्ट्रीयवाद से प्रभावित थें । वे चाहते थें कि नाटो वारसा पैक्ट के अलग गुटनिरपेक्ष देशो का संगठन हो जो अंतर्राष्ट्रीय मामलो मे अपना पक्ष रखें । भारत का राजनैतिक आर्थिक एंव सामाजिक स्तर पर विकास हो यह आंदोलन 39 वर्ष पूर्ण कर चुका है अनेक उतार चढाव पार करते हुये आज भी अपने अस्तित्व की लडाई लड रहा है । राष्ट्रवाद की भावना निःशóीकरण एंव उपनिवेशवाद की समाप्ति राष्ट्रीय विकास की इच्छा तथा सांस्कृतिक एंव जातीय पहलू ने इस आंदोलन को लोकप्रिय बनाने मे महत्वपूर्ण योगदान दिया है ।
गुटनिरपेक्ष नीति अंतर्राष्ट्रीय राजनीति मे महत्वूपर्ण स्थान प्राप्त कर चुकी है । । विश्व के दो गुटो मे संतुलन बनाना एंव विश्व शांति बनाये रखने मे गुटनिरपेक्ष राष्ट्रो ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । पराधीन राष्ट्रो को स्वतंत्र्ा कराने तथा गरीब तथा पिछडे देशो के आर्थिक विकास मे गुटनिरपेक्ष देशो ने सराहनीय योगदान दिया । मानवीय बन्धुत्व की भावना का प्रसार एंव सैनिक गुटो से अलग रहते हुये राष्ट्रीय हितो की वृद्वि मे गुटनिरपेक्षता ने महत्वपूर्ण योगदान दिया । संयुक्त राष्ट्र संघ के विभिन्न मंचो से गुटनिरपेक्षता देशो ने उपनिवेशवाद एंव साम्राज्यवाद को नियंत्र्ाित करने निःशास्त्र्ाीकरण की भावना का विकास करने जातिवाद एंव रंगभेद की नीतियों का विरोध करने नई अंतराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था के निर्माण मे सम्मलित होकर महत्वपूर्ण भूमिका निभायी और सफलता भी प्राप्त की । गुटनिरपेक्षता अंतराष्ट्रीय मानव व्यवहार का दर्शन हैै इसमे समस्याओ के समाधान के लिये बल प्रयोग का कोई स्थान नही है । इसकी सार्थकता कल भी उतनी ही रहेगी जितनी की आज है ।
आज की अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियो मे गुटनिरेपक्षता अपना अस्तित्व कायम रखने के लिये और अधिक सक्रिय सजग भूमिका निर्वाह करना होगा । गुटनिरपेक्ष देशो के निःशस्.त्रीकरण की भावना को प्रोत्साहित करते हुये अविकसित देशो मे हस्तक्षेप की नीति को कम करने का प्रयास करने होगें । नवीन अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के निर्माण मे गुट निरपेक्ष देशो को विकासशील राष्ट्रो के मध्य आर्थिक सहयोग को प्र®त्साहित करना होगा । शीत युद्ध एंव वारसा पैक्ट की समाप्ति के पश्चात गुटनिरपेक्षता का कोई ठोस राजनीतिक महत्व नही रह गया इसलिये इन राष्ट्रो को अपनी सार्थकता बनाये रखने के लिये आर्थिक क्षेत्र मे प्रभावशील करने की आवश्यकता है ।
संदर्भ ग्रंथ:-
1. अंतर्राष्ट्रीय राजनीति: डाॅ बी.एल. फडिया
2. राजनीति:- डाॅ एस.पी. गोविल डी.के बाजपेयी
3. भारतीय विदेश नीति:- डाॅ वेद प्रताप वैदिक
4. भारतीय सुरक्षा चुनौतियों एंव प्रतिक्रियाये:- डाॅ सतीष चंद्र पाण्डेय
5. गुटनिरपेक्षता भारत और भविष्य $- डाॅ एम. एस राजन
6. दैनिक जागरण:- के सुब्रम्हण्यम
7. अंतर्राष्ट्रीय संबधो पर युद्व का प्रभाव:- लल्लन सिंह
8. जनसत्ता नई दिल्ली
9. भारतीय विदेश नीति के संकेतः- डाॅ वेद प्रकाश वैदिक
10. राष्ट्रीय रक्षा और सुरक्षा:- लल्लन सिंह
Received on 14.07.2016 Modified on 10.08.2016
Accepted on 21.08.2016 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 4(3): July-Sept., 2016; Page 189-192.